देश के विभिन्न प्रांतो से आए 16 प्रख्यात वास्तु विशेषज्ञों ने करोंदी की ऊर्जा संरचना और भू-चुंबकीय प्रभाव का किया गहन परीक्षण.jpeg)
करोंदी (कटनी जिला), 16 मार्च 2026 — कटनी जिले के करोंदी क्षेत्र में — जो दीर्घकाल से भारत के भौगोलिक केंद्र बिंदु के रूप में मान्यता प्राप्त है — 14-15 मार्च को देश के 16 प्रख्यात वास्तु विशेषज्ञों द्वारा भारतीय वास्तु महासंघ के तत्वावधान में 5 स्टार वास्तु ग्रुप के सहयोग से एक व्यापक और बहु-आयामी अध्ययन सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। तीन दिवसीय इस अध्ययन यात्रा में विशेषज्ञों ने स्थल की प्राकृतिक संरचना, दिशा-ऊर्जा संतुलन, भू-चुंबकीय प्रभाव तथा पर्यावरणीय परिस्थितियों का संयुक्त एवं विस्तृत परीक्षण किया।
इसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान की सहायता से देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों को विश्व सिरमौर बनाने के लिए आवश्यक उपायों का परिक्षण और प्रभावी क्रियान्वयन करना था
स्थल का महत्व एवं पृष्ठभूमि
विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के समीप कटनी जिले में स्थित करोंदी क्षेत्र को भारत के भौगोलिक केंद्र के रूप में जाना जाता है और प्रशासन की आधिकारिक जानकारी में भी इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। देश के मध्य भाग का प्रतिनिधित्व करने वाले इस स्थान को अनेक विद्वान भारत के "हृदय स्थल" की संज्ञा देते हैं। इसी भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्ता को दृष्टिगत रखते हुए पिछले तीन वर्षों से विशेषज्ञों की एक समिति इस स्थल पर गहन शोध में संलग्न थी। हर पहलू पर सूक्ष्म चिंतन के पश्चात इस अध्ययन को एक सामूहिक, सर्वश्रेष्ठ और सर्वमान्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ संपन्न किया गया।
विशेषज्ञ दल
इस अध्ययन अभियान में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विशेषज्ञ सम्मिलित रहे, जिनमें सम्मिलित हैं —
त्रिशला सेठ • अनिल झाम्ब • उपेंद्र कुमार • इंजी. आचार्य अखिलेश जैन • रमणलाल पटेल• डॉ. अवनीश जैन •अविनाश मग्गिरवार • शालिनी गुगनानी • सुमन कोहली • अभिजीत मग्गिरवार • नरेश मित्तल • शिवरामदास • नैलेश कपाड़िया • नयना त्रिवेदी • डॉ. रवि सिंघवी • अखिलेश छाबड़ा
अध्ययन पद्धति एवं कार्यप्रणाली
अध्ययन का उद्देश्य इस महत्वपूर्ण स्थान की ऊर्जा संरचना को समझना तथा विभिन्न प्राचीन और आधुनिक वास्तु पद्धतियों के माध्यम से इसके उन्नयन के संभावित उपायों का निर्धारण करना था। विभिन्न क्षेत्रों में दीर्घ अनुभव रखने वाले इन विशेषज्ञों ने स्थल की ऊर्जा संरचना का भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण के साथ परंपरागत और अत्याधुनिक उपकरणों से परीक्षण राष्ट्रगान पश्चात किया जिसमें जिओपैथिक स्ट्रेस फाईंडर,ओरा स्कैनर, क्वांटम एनर्जी स्कैनर, डाऊजिंग, इलेक्ट्रो स्मोग फाउंडर, शंकु स्थापना, एल रॉड्स सहित कई उपकरण थे।
परीक्षण के अंतर्गत स्थल के प्राकृतिक भू-रूप, जल स्रोत, दिशा विन्यास और आसपास के पर्यावरणीय तत्वों का विस्तृत अवलोकन किया गया। साथ ही, वर्तमान में विद्यमान संरचनाओं और मार्गों द्वारा ऊर्जा प्रवाह पर पड़ने वाले प्रभाव का भी विश्लेषण किया गया। टीम ने प्राचीन भारतीय वास्तु सिद्धांतों के साथ आधुनिक भू-ऊर्जा अध्ययन, दिशा-ऊर्जा संतुलन और पर्यावरणीय विश्लेषण को समन्वित कर स्थल की ऊर्जा स्थिति का समग्र मूल्यांकन किया।
स्थान पर पूर्ण विधी विधान से वास्तु मंडल की स्थापना करके 45 देवताओं का आव्हान और प्रतिष्ठा गया के विद्वान पं उपेंद्र कुमार द्वारा की गई और उससे इस स्थल के उर्जा क्षैत्र में अप्रत्याशित 10 गुना वृद्धि मापी गई।
इस अवसर पर सरपंच अनिता कोरी और अन्य अधिकारी भी मौजूद थे तथा उपेंद्र कुमार की पुस्तक वास्तु चालीसा का भी विमोचन विद्वानों के हाथों देश के केंद्र बिंदु पर हुआ।
प्रारंभिक निष्कर्ष
तीन दिवसीय सघन अध्ययन के दौरान प्रत्येक विशेषज्ञ ने अपनी विशिष्ट पद्धति और संचित अनुभव के आधार पर अलग-अलग अवलोकन प्रस्तुत किए। तत्पश्चात सामूहिक विमर्श में उन बिंदुओं को चिन्हित किया गया जिनके आधार पर इस क्षेत्र के ऊर्जा संतुलन को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकता है।
प्रारंभिक चर्चा में यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि इस क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना मूल रूप से संतुलित है; तथापि कुछ स्थानों पर ऊर्जा प्रवाह को और अधिक व्यवस्थित करने की पर्याप्त संभावना विद्यमान है। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी संभावित सुधार में पर्यावरणीय संतुलन, स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं और क्षेत्र की मौलिक प्राकृतिक संरचना को पूर्णतः सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
"विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की प्राचीन वास्तु परंपरा केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह भूमि, दिशा और पर्यावरण के संतुलन का व्यापक ज्ञान है। यदि इस परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जाए, तो यह राष्ट्रीय विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।"
रिपोर्ट एवं भावी कदम
अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर विशेषज्ञ दल ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में स्थल की वर्तमान ऊर्जा स्थिति, संभावित सुधार उपाय तथा दीर्घकालिक विकास से संबंधित सुझाव सम्मिलित हैं। यह रिपोर्ट संबंधित शासकीय विभागों और प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी जाएगी, ताकि इस स्थान के संतुलित विकास और संरक्षण हेतु भविष्य में आवश्यक एवं ठोस कदम उठाए जा सकें।
करोंदी में संपन्न यह अध्ययन उसी दिशा में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के सुव्यवस्थित शोध से न केवल इस स्थल की सांस्कृतिक महत्ता को नई पहचान मिलेगी, बल्कि भविष्य में ऐसे अन्य महत्वपूर्ण भू-स्थलों के अध्ययन के लिए भी एक नवीन और सुदृढ़ दिशा प्राप्त होगी।

